Saturday, 30 January 2010

सईद "मुसाफिर"


કેટલાક વરસ પહેલા લખાયેલી આ ગઝલ ઇકબાલની ગઝલના ભાવને અનુસરે છે અને  શાયરની વેદનાનો પ્રતિઘોષ પણ છે. વતનની દુર્દશા - તત્કાલીન -થી વ્યથિત શાયર કહે છે,
हर शाख अपना अपना वजूद चाहती है
मजबूर हो के बैठा है बागबां हमारा
એક ઝાડ અને   સૌ ડાળને  અલાયદી ઓળખ એનાથી ઉપજેલી દ્વિધાને ખાળવામાં અસમર્થ માળી ... અને છતાં  શાયર કહે છે 
दुश्मन के इरादों से हमको न कोई डर है
अपनों की बेरुखी से डरता है दिल हमारा
enjoy !

क्या हाल हो रहा है इस देश में हमारा 
हँसते है दुनियां वाले झुकता है सिर हमारा
दुश्मन के इरादों से हमको न कोई डर है
अपनों की बेरुखी से डरता है दिल हमारा
हर शाख अपना अपना वजूद चाहती है
मजबूर हो के बैठा है बागबां हमारा
इकबाल भी न कहता गर आज जिंदा होता
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हर सख्श फंस गया है महंगाई की भंवर में
इक्कीसवी सदी का अभी दूर है किनारा
कैसे कदम बढ़ाये इस हाल में "मुसाफिर"
कांटो से भर गया है यह रास्ता हमारा
 
सईद "मुसाफिर"
15th August 1986 

Monday, 25 January 2010

सारे जहाँ से अच्छा

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा
हम बुल बुलें हैं इसकी ये गुलिस्ताँ हमारा
गुरबत में हो अगर हम रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी दिल हो जहाँ हमारा
पर्वत वो सब से ऊँचा हम साया आसमाँ का
वो संतरी हमारा वो पासबाँ हमारा
गोदी में खेलती हैं इस की हजारों नदियाँ
गुलशन है जिन के दम से रश्क -ऐ -जनाँ हमारा
ऐ आब -ऐ -रूद -ऐ -गंगा वो दिन है याद तुझ को
उतरा तेरे किनारे जब कारवाँ हमारा
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दुस्तां हमारा
यूनान -ओ -मिस्र -ओ -रोमा सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर है बाकी नाम -ओ -निशाँ हमारा
कुछ बात है की हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर -ऐ -ज़मां हमारा
'इकबाल' कोई महरम अपना नहीं जहाँ में
मालूम क्या किसी को दर्द -ऐ -निहां हमारा



गुरबत = परदेस
पासबाँ = चौकीदार
रश्क -ऐ -जनाँ = स्वर्ग की इर्ष्या
यूनान = ग्रीक, मिस्र = इजिप्त, रोमा = रोमन साम्राज्य
महरम =आत्मीय
दर्द -ऐ -निहां = छुपा हुआ -अंदरूनी दर्द