Friday, 25 June 2010

या रब - સઈદ મુસાફિર

या रब किसी से छीन कर मुझ को खुशी न दे
जो दूसरों पे भार हो वो जिंदगी  न दे
 
सज़दे में ही पड़ा रहूँ दिन रात तेरे लेकिन
जिसमे दुआ न निकले वो बंदगी न दे
 
रहने  दे  ज़मीं पर ही उड़ना नहीं है मुझको
ज़ख़्मी हो जब परिंदे परवाज़गी न दे
 
साकी हो जाम भी हो महफ़िल हो शाम भी हो
पीकर कदम न बहके वो मयकशी न दे
 
दुश्मन के भंवर से तो वाकिफ हूँ मैं  मगर
साहिल पे जो डुबोये वो दोस्ती न दे
 
चलने दे "मुसाफिर" को तन्हा ही राह में
जो कांटे ही बिछाए वो रहबरी न दे
 
सईद "मुसाफिर"
१२ जून २०१०  

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