Friday, 30 January 2009

काहिली और तवक्कुल

काहिली और तवक्कुल में बड़ा फ़र्क़ है यार
उट्ठो, कोशिश करो, बैठे हुए किस ध्यान में हो
-अकबर इलाहाबादी
रंज से ख़ूगर हुआ इंसां तो मिट जाता है रंज
मुश्किलें इतनी पड़ीं मुझ पे कि आसां हो गयीं
-ग़ालिब

फ़ासले

कोई हाथ भी न मिलायेगा जो गले मिलोगे तपाक से
यह नये मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
-बशीर बद्र

नयी तहज़ीब

नयी तहज़ीब में दिक़्क़त ज़ियादा तो नहीं है
मज़ाहिब रहते हैं क़ायम, फक़त ईमान जाता है
-अकबर इलाहाबादी

दीवारका साया

रेत की ईंट की पत्थर की हो या मिट्टी की
किसी दीवार के साये का भरोसा क्या है-
शाहीद कबीर

अकबर इलाहाबादी

सुकूने क़ल्ब की दौलत कहाँ दुनिया-ए-फ़ानी में
बस इक ग़फ़लत सी हो जाती है और वो भी जवानी में

अकबर इलाहाबादी

Thursday, 29 January 2009

इश्क

रोने से इश्क में बेबाक हो गए
धोये गए इस तरह के पाक हो गये

ग़ालिब

એ બોલી - ‘બાબુલ’

એક છોકરી પાછળ છોકરાંની કતાર થઈ ગઈ
ગામ આખાની રોજની રફતાર થઈ ગઈ
ના પુછ મારી હથેળી કાં માલદાર થઈ ગઈ
એ બોલી ‘બાબુલ’ બસ સહુની હાર થઈ ગઈ

Wednesday, 28 January 2009

इंतज़ार का मौसम

कई दिनों से मेरे निमवा दरीचों में ठहर गया है
तेरे इंतज़ार का मौसम
.... नामालुम

Tuesday, 27 January 2009

શુન્યોના સરવાળા - ‘બાબુલ’

કાળા કાળા પાણા ઉપર ચકલાઓના ચાળા
મહેલોથી યે ઉંચા ઉંચા મુરઘીઓના માળા
બગાસાનાં ખંડેરોમાં ઉભા કરોળિયાના ઝાળા
વાહ રે ઉપરવાળા તારા શુન્યોના સરવાળા