Thursday, 9 April 2009

तुम्हारी याद

तुम्हारी याद के जब ज़ख्म भरने लगते है
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते है
... ...
सबा से करते है गुरबत -नसीब ज़िक्रे -वतन
तो चश्मे- सुबह में आंसू उभरने लगते है

फैज़ अहमद फैज़

गुरबत नसीब = बेवतन ( Exiled)
चश्म = आँख, नजर

No comments:

Post a Comment